वर्ण उच्चारण में प्रयत्न


वक्ता को वर्णो के उच्चारण में जो यत्न करना पड़ता है, उसे 'प्रयत्न' कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है :-
1. आभ्यन्तर प्रयत्न 2. बाह्य प्रयत्न। 
इन दोनों का सम्बन्ध क्रमशः मुख विवर के भीतरी तथा बाहरी भाग से है।

🏵️"आभ्यन्तर प्रयत्न"🏵️
किसी वर्ण के उच्चारण करते समय हमारी जिा को मुख विवर में विद्यमान कण्ठ, तालु आदि भिन्न-भिन्न स्थानों को छूने में जो यत्न करना पड़ता है उसे “आभ्यन्तर प्रयत्न" कहते हैं । ये प्रयत्न मुख विवर के भीतर जिह्वा द्वारा किये जाते हैं, इस कारण इन्हें आभ्यन्तर प्रयत्न कहते हैं।
भेद :- आभ्यन्तर प्रयत्न पाँच प्रकार के हैं :-
1. स्पृष्ट
2. ईषत् स्पृष्ट
3. विवृत
4. ईषत् विवृत्
5. संवृत ।

इनका विवरण इस प्रकार है :-
1. स्पृष्ट :- क् से म् तक कवर्गादि पाँचों वर्गों के 25 वर्गों का स्पृष्ट प्रयत्न है, क्योंकि इनके उच्चारण में जिह्वा का कण्ठ,तालु आदि स्थानों पर पूरी तरह स्पर्श होता है ।

2. ई षत्-स्पृष्ट :- य, र, ल, व् का ईषत्-स्पृष्ट प्रयत्न होता है, क्योंकि इन अन्तःस्थ वर्गों के उच्चारण के समय जिह्वा का कण्ठ, तालु आदि स्थानों पर थोड़ा, थोड़ा स्पर्श होता है, पूरा नहीं ।

3. विवृत :- अकार आदि समस्त स्वर वर्णो का विवृत प्रयत्न होता है । क्योंकि जिहा और मुख विवर के उपरिभाग के बीच अधिक से अधिक दूरी रहती है ।

4. ईषत्-विवृत :- श्, ष, स्, ह, वर्णों का ईषद्
श, ष, स्, ह, वर्णों का ईषद् विवृत प्रयत्न है । इन ऊष्म अक्षरों के उच्चारण के समय जिहा और मुख
विवर के उपरिभाग की दूरी अपेक्षाकृत कम होती है ।

5. संवृत :- ह्रस्व 'अ' का संवृत प्रयत्न होता है । प्रयोग में हस्व 'अ' संवृत होता है ; परन्तु प्रक्रिया दशा में वह विवृत ही माना जाता है । इसके उच्चारण के समय मुख-विवर बहुत कुछ बन्द सा होता है अतः इसे 'संवृत' कहते हैं ।

आभ्यन्तर प्रयत्न तालिका👉

🏵️बाह्य प्रयत्न🏵️
जिस प्रकार वर्णोच्चारण में मुख-विवर के भीतर जिहा को कण्ठतालु आदि स्थानों को छूने का प्रयत्न करना पड़ता है और उन्हें आभ्यन्तर प्रयत्न कहते हैं, उसी प्रकार वर्णोच्चारण के लिए मुख विवर से बाहर श्वासनालिका में विद्यमान स्वरयन्त्र, की तन्त्रियों में भी प्रयत्न अपेक्षित है । उसे 'बाह्य' प्रयत्न कहते हैं

यह बाह्य प्रयत्न तीन कारणों से होता है :-
(क) स्वर तन्त्रियों के कुछ-कुछ दूर रहने या निकट आकर सट जाने से।
ख) फेफड़ों से निकलकर आने वाली वायु के अधिक या कम होने से।
(ग) स्वर तन्त्रियों के कम्पनों की आवृत्ति या अधिक होने से।

बाह्य प्रयत्न के भेद 🌼ये ।। प्रकार के होते हैं
1. विवार
2. संवार
3. श्वास
4. नाद
5. घोष
6. अघोष
7. अल्पप्राण
8. महाप्राण
9. उदात्त
10. अनुदात्त
11. स्वरित।

क) 1. विवार :- जिन वर्णो के उच्चारण के समय स्वरतन्त्रियों के (Vocalchords) दूर-दूर रहने के कारण कण्ठद्वार काकल) खुल रहता है, उसे विवार कहते हैं।

2. श्वास :- उस समय उनसे बाहर निकलने वाली श्वास सदृश होती है। अतः उसे श्वास कहते हैं।

3. अघोष : और उस समय स्वरतन्त्रियों के खुले रहने के कारण जो वर्ण उच्चारण किये जाते हैं, वे विशेष गूंज पैदा
नहीं करते अतः अघोष कहलाते हैं

4. संवार : इसके विपरीत जब स्वरतन्त्रियां (Vocalchords) सट जाती हैं तो उसे संवार कहते हैं।

5. नाद :- उस समय निःश्वास वायु के निकलते समय कम्पन पैदा होता है। अतः उसे नाद कहते

6. घोष- इस अवस्था में जिन ध्वनियो का गूंज के साथ उच्चारण होता है। उन्हें घोष कहते हैं
अर्थात् स्वर तत्रियों के दूर-दूर रहने पर विवार, श्वास तथा अघोष प्रयत्न होते हैं और उनके सट जाने पर संवार, नाद तथा घोष (या सघोष) प्रयत्न होते हैं

7. (ख) अल्पप्राण :- जिन वर्णो के उच्चारण करने में फेफड़े से निकलने वाली वायु (प्राण) का अल्प उपयोग हो उन्हें 'अल्पप्राण' कहते हैं।

8. महाप्राण :- जिनके उच्चारण में वायु का अधिक उपयोग हो उन्हें 'महाप्राण' कहते है।

9. (ग) उदात्त :- स्वरतन्त्रियों में कम्पन की आवृत्ति अधिक होने पर 'उदात्त' स्वर उत्पन्न होते हैं।
स्वरतन्त्रियों में कम्पन की आवृत्ति अधिक होने पर ‘अनुदात्त' स्वर उत्पन्न होते हैं।

11. 'स्वरित' : स्वरतन्त्रियों के कम्पन की आवृत्ति मिश्रित होने पर स्वर उत्पन्न होते हैं।

इस प्रकार इन वर्गों के बाह्य प्रयत्न संक्षेप में निम्न हैं :-
(1) प्रत्येक वर्ग के प्रथम-द्वितीय वर्ण (क् - ख्, च् - छ्, ट् - ट्, त् - थ्, प् - फ्) श् - ष् - स् (अर्थात् खर्
प्रत्याहारका) का विवार, श्वास और अघोष प्रयत्न हैं ।

(2) प्रत्येक वर्ग के तीसरे चौथे और पांचवें वर्ण (ग् - घ् ङ्, ज् - झ् - ञ्, ड् - ढ् - ण, द् - ध्- न्, ब्- भू - म्) और अंतस्थ(य्, र्,ल - व्) तथा 'ह' का (अर्थात् हश् प्रत्याहारका) संवार, नाद,घोष प्रयत्न हैं

(3) प्रत्येक वर्ग के प्रथम वर्ण ( क्, च्, ट्, त्, प्) तृतीय वर्ण ( ग्, ज्, इ, द्, ब् ) और पंचम वर्ग (ङ ञ ण न म्) तथा अन्तःरथ ( य् -र् - ल् - व् ) वर्णों का अल्पप्राण प्रयत्न है

(4) इसके विपरीत प्रत्येक वर्ण का द्वितीय वर्ण ख् छ ठ थ् प् तथा चतुर्थ वर्ण (घ झ ढ ध भ) तथा उष्म वर्ण
(श ष, स ह्) का महाप्राण प्रयत्न है ।

(5) स्वरित नियमों पर आघात या कंपन की आवृति से ऊंचे नीचे और मिश्रित स्वर से उच्चरित ध्वनियाँ क्रमशः उदात्त अनुदान्त तथा स्वरित कहलाती है। ये तीनों स्वर केवल अकारादि स्वर वर्णो के होते है, व्यंजन वर्गों के नहीं। इनका प्रयोग विशेष रूप से वैदिक भाषा में होता है। लौकिक संस्कृत भाषा में नहीं। लौकिक संस्कृत भाषा के व्याकरण में बाह्य प्रयत्नों में मुख्य उपयोग घोष अघोष तथा अल्प प्राण महाप्राण का है, शेष का नहीं। व्यंजन सन्धि तथा विसर्ग- सन्धि के समझने में ये चारों प्रयत्न
सहायक हैं।

"बाह्य प्रयत्न तालिका"
1. खरो विवाराः श्वासाः अघोषश्च ।
2. हशः संवारा नादा घोषाश्च।
3. वर्णानां प्रथम-तृतीय पंचमाः य र ल वश्चाल्पप्राणाः।
4. अन्ये च महा प्राणाः
Notes By - Prashant Shukla

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